Sunday, April 5, 2009

परछाईं

यूँ तो तुम,
हर पल
साथ साथ हो -
लेकिन-
मेरे संवेदनों ,
मेरी भावनाओं से दूर !

मैंने बचपन में -
तुम्हें हर पल का साथी समझा था ,
लेकिन-नहीं.....!
तुम कभी दूर-कभी पास
व्यर्थ ही गतिशील !
तुम मुझे शायद समझ नहीं सकती -
क्यूँ कि-
तुम-
बारिश कि फुहारों में धुन्धलाती-
मेरी 'परछाईं ' मात्र हो !
- गंगेश राव

4 comments:

  1. this too nice poem and so imotional.

    ReplyDelete
  2. mama g ap to poet hogaye ho.

    ReplyDelete
  3. bhai sahab rachna ka rup nahi samjh saka
    agar ise geet kahe
    or dil ko bhaut achi lagi aapki rachna sach me par dimag ise geet kahne me sankoch kar raha hain
    ya ho sakta hain aap ki ichha kuchh or rahi ho
    shesh kushal

    ReplyDelete
  4. यह काव्य रचना अलसाई क्यों है ?

    ReplyDelete